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वह बिस्तर से उठी, चाय बनाने चली गई। चाय की केतली चढ़ी, तभी उसकी नज़र पुरानी डायरी पर पड़ी जो किताबों के बीच दबी थी। उसने डायरी खोली। पन्ने पीले पड़ चुके थे। एक जगह लिखा था:

उसने एक रेखा खींची। फिर दूसरी। फिर एक आकाश बनाया — नीला नहीं, बल्कि ऐसा नीला जैसे सपनों में दिखता है। फिर एक पेड़ बनाया — जिसकी जड़ें ज़मीन से बाहर थीं, आसमान की तरफ उठ रही थीं। antarvasana-hindi-kahani

पहली बार उसने ब्रश उठाया तो हाथ काँपा। उसे लगा जैसे कोई उसे देख रहा है। पर कोई नहीं था। सिर्फ दीवारों पर उसकी अपनी परछाइयाँ थीं। वह बिस्तर से उठी

मीरा एक सामान्य गृहिणी है। उसकी दिनचर्या सुबह से रात तक दूसरों के लिए होती है — पति के लिए, बच्चों के लिए, घर के लिए। पर वह अपने लिए कब जीती है? उसकी अंतर्वासना कला है — पेंटिंग करने की इच्छा। यह इच्छा न तो गलत है, न ही असंभव। फिर भी वह उसे दबाती है, क्योंकि समाज ने उसे सिखा दिया है कि 'लड़कियाँ पेंटिंग करके क्या करेंगी?' बच्चों के लिए

जब वह पेड़ बनाती है जिसकी जड़ें आसमान की तरफ उठ रही हैं, तो यह एक प्रतीक है — वह पेड़ मीरा खुद है, जो ज़मीन की कैद से मुक्त होना चाहती है, आकाश की ओर बढ़ना चाहती है। वह रोती है, लेकिन दर्द से नहीं — राहत से। क्योंकि दबी हुई वासना को बाहर निकालना ही मुक्ति है।

(एक कहानी)

आलोक उठा, तैयार हुआ, ऑफिस चला गया। बच्चे स्कूल गए। मीरा ने खाना बनाया, कपड़े सुखाए, फर्श पोंछा। शाम को सब लौटे। खाना खाया। टीवी देखा। सब सो गए।